कासिम पयाम-ए-शौक़ को इतना ना कर तवील,
कहना फ़क़त ये उन से के, आँखे तरस गयी
आखिरी दीदार कर लो खोल कर मेरा कफ़न,
अब ना शरमाओ के चश्म-ए-मुन्तजिर बे'नूर है
चले भी आओ के मैराज़-ए-इश्क हो जाए
आज की रात अकेला हूँ मैं खुदा की तरह
जब भी गुजरे लम्हात की याद आएगी
होंठ सी लूँगा मगर आँख तो भर आएगी
आशना दर्द से होना था हमें
तू ना मिलता तो किसी और से बिछुड़े होते
एक इसी भी घड़ी इश्क में आयी थी हम तक
ख़ाक को हाथ लगाते तो सितारा करते
अजीब कहर पड़ा अबके साल अश्कों का,
के आँख तर ना हुयी खूं में नहा कर भी
क्या अजीब शख्स है भेद ही ना खुलते उसके,
जब भी देखूं तो दुनिया से खफा ही देखूं
बहुत अजीब है ये सिलसिला मुहब्बत का,
ना उसने कैद में रखा ना हम फरार हुए
अपने सिवा बताओ कभी कुछ मिला है तुम्हें,
हजार बार ली हैं तुमने मेरे दिल की तलाशियां
जो लिखता फिरता है दीवार-ओ-दर पे नाम मेरा,
बिखेर दे ना कहीं हर्फ़ हर्फ़ करके मुझे
इस सादगी पे कौन ना मर जाए ऐ खुदा
लड़ते है और हाथ में तलवार भी नहीं
रफ्ता रफ्ता भूले है उसे मुद्दतों में हम,
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा मुझसे पूछिए
झूठ बोला है तो उस पर कायम भी रहो 'ज़फर'
आदमी को साहिब-ए-किरदार होना चाहिए
समझ जाता हूँ देर से मैं दांवपेच उसके,
वो बाजी जीत जाता है मेरे चालाक होने तक
बेरुखी बे'सबब नहीं 'गालिब'
कुछ तो है जिसकी पर्दा'दारी है
चाँदनी बन के बरसती हैं तेरी यादें मुझ पर,
बड़ा दिलकश मेरी तनहाइयों का मंज़र होता है
फर्क इतना है मुझ में और युसूफ में "फ़राज़"
उसको गैर मुझको यार बेच देते हैं
"मैं खुद गरज इतना हूँ के बस यही चाहूँ
रहें हमेशा मेरी मुन्तज़िर तेरी आँखें"
इतनी सिद्दत से ना कर तर्क-ए-ताल्लुक का सवाल,
ऐसा ना हो के हम से तेरी बात ना टाली जाए
एक ताल्लुक था सो आया हूँ खुदाया, वर्ना
कौन आता है तेरी महफ़िल में तमाशा बनने
मुझे आजाद कर तौक-ए-असीरी बख्सने वाले,
मैं ज़ंजीरों में ऐलान-ए-बगावत कर नहीं सकता
मेरी मुश्किल ये है मुझको अदाकारी नहीं आती,
हकीकी आदमी रस्मी मोहब्बत कर नहीं सकता










